Thursday, September 11, 2014

सितमगर आँख में भरते थे पानी, आसूं दिखाने के लिए..



सितमगर आँख में भरते थे पानी, आसूं दिखाने के लिए..
हमने खून तक हाज़िर किया, उनकी प्यास बुझाने के लिए..
वो मेरे गुलशन का ‘फुल’ भी ले गए पत्थर से तोड़ कर,
अपने घर का गुलदस्ता सजाने के लिए..

मेरी हालत जो मेरे तक़दीर ने देखा है..
रात भर वो भी मेरे दर्द पे मेरे साथ ही रोया है..
वो मेरा कातिल कब-तक रहेगा महफूज, मुजरिमों के पनाहों में,
आएगी एक दिन वो आंधी, उसकी बार्बदी के लिए..

कोई पुछे तो सही बेवफाई क्या है..
उनकी ये कामयाबी हाज़िर है हर जबाबो के लिए..
वो अपना चेहरा कभी आईने में जो देखते होंगे..
दर-बदर भागते होंगे, अपनी सूरत छुपाने के लिए..

ना पूछो की इस बेजान दिल की चाहत क्या है..
हर तम्मना, आरजू, ख्वाइश, हसरत, अब तो राख है..
फिर भी राख और वो ‘पत्थर’ संभाला है मैंने,
खुदा को दिखाने के लिए..

सितमगर आँख में भरते थे पानी, आसूं बताने के लिए ..                     

- राकेश झा

Sunday, March 18, 2012

कल जो बारिश हुई, समाँ महकने लगा था

कल जो बारिश हुई, समाँ महकने लगा था

मैं पीता नहीं, पर बहकने लगा था


होने लगी थीं घटाऎं दीवानी, रौनक बिछाए थी बिजली जमीं पर

हवाओं की ईठलाती-बलखाती अंदाज ना पुछो

जिधर से गुजरती नशा ही नशा था ...

कल जो बारिश हुई, समाँ महकने लगा था


बड़ी कौतुहल थी चारों तरफ

परिंदों ने मिलके जब नया गीत छेड़ा

बारिश के लहरों ने सुर को सजाया

वो मोती सी बुँदें थिरकने लगी थीं ...

कल जो बारिश हुई, समाँ महकने लगा था


बड़ी हसीन शाम वो हुई थी

किसी के भी चेहरे पे ना शिकवे गिले थे

मस्ती में मस्ती के सब मतवाले हुए थे

कैसे हुआ ये, ना आये यकीं था ...

कल जो बारिश हुई, समाँ महकने लगा था


चारों तरफ मैंने जब नज़रें फिराई

चलता गया उसकी आगोश तक

देखा तो बस यूँ नजरें हटी ना

ना जाने कितने नगीने लपेटे हुई थी

कँप-कँपाते लबों की सुर्खियों पर

सुर्ख गुलाबों की शोखी रंगाई हुई थी

वो हुस्न-ए-परी, एक भींगी लड़की खड़ी थी ...

कल जो बारिश हुई, समाँ महकने लगा


कल जो बारिश हुई, समाँ महकने लगा था

मैं पीता नहीं, पर बहकने लगा था


- राकेश झा

crazzyrk@gmail.com